Saturday, March 18, 2017

एक गीत

गीता का उपदेश यही है,
कुछ नहिं तेरा मेरा है।
माया-मोह जगत का आँचल,
जनम-मरण सब फेरा है।

फल की चिंता कभी न करना,
करम तो बस निष्काम है,
जीव-जगत मिथ्या ही जानो,
भरम ही इसका नाम है,
सूत्रधार बैठा है ऊपर,
उसने चित्र उकेरा है।

काम-क्रोध, मद, लोभ यहाँ पर,
खींचेगा ही पल-पल में,
बच न सका तो जीवन होगा,
पाप-पंक के दलदल में,
हर क्षण हर पल निकट सभी के,
मद का रहता डेरा है।

राजा हो या रंक सभी को,
मिट्टी में मिल जाना है,
अंतिम लक्ष्य न समझ सका तो,
अंत समय पछताना है,
मोक्ष धाम का साधन कर ले,
अभी समय भी तेरा है।


सपन (17.03.2017)

Thursday, September 29, 2016

भागता वक़्त


पश्चिम में वक़्त ज़रा तेज़ भागता है
या फिर महीने के बदले हफ़्ते की इकाई 
रफ़्तार की तेज़ी का एहसास देती है। 

कभी कभी बड़ी शिद्दत से याद आता है 
अपना ऊँघता-सा छोटा-सा गाँव 
जैसे तारीख़ के पन्नों में 
 ठहरा हुआ वक़्त का एक टुकड़ा 
चीज़ें कुछ थोड़ी थीं 
पर इत्मीनान बहुत था। 

अब तो न वो नगरी, न वो ठाँव 
न बाँसों की झुरमुट, न बरगद की छाँव
अब तो बस भागता वक़्त है और भागते आप 
सोम से शुक्र, सुबह से शाम 
बस भागमभाग, भागमभाग 
अनवरत, लगभग निरुद्देश्य 
गंतव्य बस एक पड़ाव 
मंज़िल की कौन सोचता है? 

और फिर होती है शाम 
दिन भर का थका हारा वक़्त 
जब थोड़ी साँस लेता है 
तब तारी होता है 
तुम्हारा पुरसुकून ख़याल 
पड़ावों के बीच जैसे 
मंज़िल का गुमान 
मुझमें तुममें कोई तो राह है! 

डाॅ विभास मिश्रा

Saturday, June 11, 2016

क्या करें ?


रात का पिछला पहर है, 
व्यग्र है जो भी लहर है। 
ढीठ बन पुरवाइयों ने, 
फिर जगाया कौन स्वर है ? 
मूँदकर पलकें तो देखें, 
कौन सा सपना मुखर है, 
रात के पिछले पहर का क्या करें ? 

दोष क्या कादम्बिनी का ? 
रेत का मन ही हमारा। 
पत्थरों की इस गली में 
काँच का है घर हमारा। 
जब कभी मधुमास छाया, 
मन हुआ पतझड़ हमारा। 
टूट जातीं व्यग्र लहरें 
चूम पथरीला किनारा। 
टूट कर बिखरी लहर का क्या करें ? 

संशयों के जाल में फँस, 
फड़फड़ाता मन हमारा, 
पर सदा आकाश छूने को 
मचलता मन हमारा, 
जूझता शंका, द्विधा के 
पाश से भी जो न हारा, 
लोल लहरों से प्रताड़ित, 
ढह रहा पल पल किनारा, 
मन बड़ा आकुल, भँवर का क्या करें ? 

नवपलाशों से सुलगती 
पोर तक पहुँची पिपासा। 
जेठ की इस दोपहर में, 
हंस मर जाये न प्यासा, 
गिद्ध बन मँडरा रही है, 
प्राण तक पैठी निराशा। 
बुद्धि की निर्मम नदी में 
है हृदय का घाट प्यासा। 
जेठ की इस दोपहर का क्या करें? 

सरलता, संवेदना की 
निष्कपट गहराइयों से। 
कुमुद, महुए, केतकी से, 
उन सघन अमराइयों से, 
यह नगर अनजान क्यों है 
स्नेह की परछाइयों से ? 
पत्थरों के इस नगर का क्या करें ? 

आँधियाँ चलने लगी हैं, 
हम चढ़े जब भी शिखर पर। 
बिजलियाँ गिरती रही हैं 
क्यों हमारे ही शिविर पर?
प्रश्नचिन्हों ने न छोड़ा, 
आजतक पीछा कहीं पर। 
वर्जनाओं के तने फन, 
हम रुके जिस ठौर पल भर। 
वे कहाँ लौटे कभी जो 
चल पड़े ऐसी डगर पर। 
धुंध में खोती डगर का क्या करें? 

मत लगाओ आज अंकुश, 
इस उफनती सी लहर पर। 
अब सुधा हो या गरल हो, 
आज झरने दो अधर पर। 
छाँह के प्यासे चरण अब, 
दृष्टि पर मेरी शिखर पर। 
राख हो जायें भले ही, 
आग की तपती डगर पर, 
नीड़ छूटे, साँस टूटे, 
ध्यान क्या दूँ भंग स्वर पर ? 
नीड़ से बिछड़ी डगर का क्या करें ?" 

*****शैलेन्द्र कुमार

Friday, May 27, 2016

बरसो वारिद


बरसो वारिद बरसो वन-वन 
हे सरसवान जीवनधर बन 
धरती गतकल्मष हो जाए 
नूतन प्ररोह निकल जाए 
करुणार्द्र दृष्टि से देख जरा
विहँसे जग के सारे उपवन। 

गर्जन से प्यास नहीं जाती 
तर्जन से शान्ति नहीं आती 
नदियाँ,नद, घट भरकर निर्झर 
दृगहर्षित हो जा चमन-चमन। 

हो प्रजावती धरती मेरी छोड़ो 
नभगर्जन की भेरी चातक का 
प्रिय सहचर जा बन खिलने दो 
आँगन, तुलसी बन। 

तेरा चिन्तन हो अतिविराट 
हे नील गगन के मानराट 
गौरव का हर्ष लुटाकर तुम 
बन जा निसर्ग के सखापवन। 

मानद भूषण तू परम व्योम के 
धरती, नभ के, उत्तम कुल के हो 
त्यक्तवर्म वर लोकोत्तर प्रणयी 
मन भाव करो गोपन। 

प्रोषितपतिका की साँसें बन-बन 
वत्सवत्सला अंचल घन 
धरती की दीर्ण दरारों में उतरो 
उशती रजबाला बन। 

किंजल्क निचय पर करो दया 
गढ़ दो लुटकर प्रतिमान नया 
हे मरुद्रथी शक्रावतार सब करें 
तेरा नत अभिनन्दन। 

*** "मधुपर्क" ***

Saturday, May 21, 2016

पारुल (एक कहानी)


मोटर साइकिल तेज़ी से बगल से निकला। पारुल लगभग टकराते टकराते बची। सड़क पर इतनी भीड़ थी कि किसी ने ध्यान भी नहीं दिया कि एक तीन साल की बच्ची अकेले इस तरह चली जा रही है। मैं सड़क के दूसरी तरफ था। मैंने दुकानदार से कहा कि यह तो वही बच्ची है न जिसके पिताजी एक साल पहले गुजर गए थे। उसने मेरी तरफ गौर से देखा 

मुझे उसके पिताजी से कुछ वर्षों पहले हुई बातचीत याद आ गयी। उस दिन उन्होंने पूरे मोहल्ले में मिठाई बँटवाई थी। उन्होंने मुझे कहा था कि उनके घर में लक्ष्मी आई थी। देखना मेरी बेटी बड़ी होकर कितना नाम कमायेगी। वो बोले, अब ज़माना बदल रहा है, मेरी बेटी सौ बेटों के बराबर होगी। फिर मुझे पता चला कि उसके कुछ दिनों के बाद पारुल के पिताजी एक सड़क दुर्घटना के शिकार हो गए। पारुल तब ढाई साल की रही होगी। मैंने देखा था पारुल कैसे अर्थी पर लेटे अपने पिताजी को उठा रही थी। अपनी तोतली आवाज़ में कह रही थी, "पापा उठ, तलो घूमी करने।" पर निष्प्राण शरीर कहीं भला उठ पाता है! उस दिन पारुल गेट से दूर तक पिताजी को श्मशान के तरफ ले जाते हुए लोगों को देखती रही। शाम को सब घर आये पर पारुल के पापा नहीं आये, बार-बार पारुल माँ को कहती – "मामा, पापा कब आयेंगे?" पापा की चप्पल को लेकर पारुल गेट के तरफ जाती और गेट की जाली से देखती कि पापा आयेंगे, तो चप्पल पहना कर सोफे पर उनके साथ बैठूँगी। यह पारुल का पहले रोज का रूटीन था कि पापा के आते ही गेट तक पारुल एक चप्पल लेकर दौड़ कर जाती थी और फिर पापा की गोद में बैठकर सोफे पर पापा के साथ थोड़ी देर खेलती थी। बहुत देर तक जब पापा नहीं आये तो पारुल चप्पल को सीने से लगाये सोफे पर बैठ गयी। और पापा-पापा कहते कहते वहीं सो गयी। मुझे याद है रिश्तेदारों में से कोई पारुल के यहाँ झाँकने तक भी नहीं आया। जब तक पारुल के पापा जिन्दा थे, तो पैसे ऐंठने के लिए रिश्तेदार आते रहते थे। वो थे भी सरल हृदय और उनसे जो बन पड़ता, सबकी सहायता किया करते थे। पर अब, जब वो इस दुनिया में नहीं हैं, तो कौन अपना भाड़ा लगाकर इतनी दूर से मिलने आते। दिन, सप्ताह और महीने बीत गए और शायद पारुल तीन साल की हो गयी थी। 

एक दिन शाम को मैंने देखा कि पारुल रो-रो कर जोर-जोर से बोल रही है- "मामा, मत जाओ, हमको भी साथ ले लो मामा।" पारुल माँ के पैरों में लटक गयी थी, और पैरों से घिसटते हुए वह बहुत दूर घर से सड़क तक आ गयी थी। घसीटने के कारण पारुल का हाथ-पैर छिल गया था। उसकी माँ बिना कुछ बोले ही कार में बैठ गयी। कार में पहले से एक युवक बैठा हुआ था। कार धूल और धुँएं का गुबार पीछे छोड़ता हुआ आगे बढ़ गया। पारुल रोड पर अकेली सूनी सड़क पर टायरों के द्वारा छोड़ी गयी लकीर को देखती और रोती हुई वहीं लेट गयी। बाद में पता चला कि पारुल की माँ दूसरी शादी करके पारुल को छोड़कर चली गयी है। 

घर में सिर्फ दादा, दादी और पारुल रह गये। एक समय पारुल के लिए सुबह-शाम खिलौनों और मिठाइयों की घर में कमी नहीं रहती थी। अब पारुल अपने ही घर में ही बेगानी हो गयी। दादा-दादी अधिक उम्र के कारण कोई भी काम करने में अक्षम थे। बेटे ने जो कमा कर रखा था, उसी से घर का खर्चा किसी तरह चलाने की कोशिश की, पर घर बस चलता ही था। जब जवान बेटा चला जाए और बहु बेटे के ऊपर जाते ही मुँह फेर ले, तो जीवन से और कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। उस दिन के बाद आज मैं पारुल को देख रहा था। कभी फैंसी फ्रॉक से ढकी रहने वाली पारुल आज सिर्फ एक छोटी सी फटी हुई पैंट और एक गन्दी सी बनियान में दिख रही थी। और वो भी इस भीड़-भाड़ वाली सड़क पर अकेले। मैंने सोचा कि उस पार जाकर पारुल को गोद में उठाकर कुछ बिस्किट और चोकलेट दे दूँ। दो तीन रिक्शेवाले मेरे सामने आ गए, मैं उनसे बचकर उस पार जाने लगा, पर ज्यादा भीड़ के कारण मुझे आगे बढ़ने में दिक्कत हो रही थी। इसी बीच एक काली कार तेज़ी से उल्टी दिशा से सड़क पर आ रही थी। मैंने रिक्शेवाले को तेज़ी से हटने का इशारा किया, पर मेरे कानों में तेज़ी से कार के ब्रेक लगने की आवाज़ आयी। मैं पारुल के तरफ देखा तो सहम गया। पारुल कार के धक्के से हवा में उछल गयी थी। उसके बाल हवा में पूरी तरह बिखर गये थे और रक्त की बूँदें उसकी नाक और उसके कानों से रिस-रिसकर बाहर आने लगा था। मुझे यह दृश्य देखकर सदमे से बेहोशी सी महसूस होने लगा और धीरे धीरे मैं भी ज़मीन पर गिरने लगा। गिरते-गिरते मैं देख रहा था कि पारुल हवा में दोनों हाथ ऐसे फैला कर गिर रही थी कि मानो उसके पापा अदृश्य रूप से उसके सामने खड़े हों और वो उनसे मिलने के लिए राजहंस की तरह तैरती हुई जा रही हो। मैं ज़मीन पर धम से गिरा और मेरी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगी। बंद आँखों से मैंने देखा कि पारुल ज़मीन पर खून से सनी हुई अधखुली आँखों से मेरी तरफ देख रही थी। दूर आसमान में एक सफ़ेद पंछी डूबते सूर्य की आभा को चीरते हुए आसमान की ऊँचाइयों में विलीन हो रहा था और नीचे ज़मीन पर बाज़ार में मुझे दूर से आती हुई मध्यम संगीत सुनाई दे रही थी –गुड़िया रानी परियों की दुनिया से एक दिन राजकुँवर जी आयेंगे .............!! 

***** उदय कुमार