Sunday, June 20, 2021

बीती विभावरी जाग री

 जय शंकर प्रसाद की अमर रचना का गायन संभव है आपको प्रभावित करे। 

आप सभी सुनें और बतायें कि कैसा लगा?

लिंक नीचे है। 

https://youtu.be/f-eAYmD2uV4


Friday, June 18, 2021

क्षमा करें।

 बहुत दिनों से यह ब्लॉग शांत रहा, अतः क्षमाप्रार्थी हूँ। अब से प्रति सप्ताह कुछ न कुछ होता रहेगा, यही प्रयास होगा। 

इस सप्ताह आप सभी के लिए यह लिंक प्रेषित है। या मेरे द्वारा गायी एक ग़ज़ल है यूट्यूब पर। 

यदि पसंद आए तो चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करें।

https://youtu.be/y4EVgn7lx7A


Saturday, March 18, 2017

एक गीत

गीता का उपदेश यही है,
कुछ नहिं तेरा मेरा है।
माया-मोह जगत का आँचल,
जनम-मरण सब फेरा है।

फल की चिंता कभी न करना,
करम तो बस निष्काम है,
जीव-जगत मिथ्या ही जानो,
भरम ही इसका नाम है,
सूत्रधार बैठा है ऊपर,
उसने चित्र उकेरा है।

काम-क्रोध, मद, लोभ यहाँ पर,
खींचेगा ही पल-पल में,
बच न सका तो जीवन होगा,
पाप-पंक के दलदल में,
हर क्षण हर पल निकट सभी के,
मद का रहता डेरा है।

राजा हो या रंक सभी को,
मिट्टी में मिल जाना है,
अंतिम लक्ष्य न समझ सका तो,
अंत समय पछताना है,
मोक्ष धाम का साधन कर ले,
अभी समय भी तेरा है।


सपन (17.03.2017)

Thursday, September 29, 2016

भागता वक़्त


पश्चिम में वक़्त ज़रा तेज़ भागता है
या फिर महीने के बदले हफ़्ते की इकाई 
रफ़्तार की तेज़ी का एहसास देती है। 

कभी कभी बड़ी शिद्दत से याद आता है 
अपना ऊँघता-सा छोटा-सा गाँव 
जैसे तारीख़ के पन्नों में 
 ठहरा हुआ वक़्त का एक टुकड़ा 
चीज़ें कुछ थोड़ी थीं 
पर इत्मीनान बहुत था। 

अब तो न वो नगरी, न वो ठाँव 
न बाँसों की झुरमुट, न बरगद की छाँव
अब तो बस भागता वक़्त है और भागते आप 
सोम से शुक्र, सुबह से शाम 
बस भागमभाग, भागमभाग 
अनवरत, लगभग निरुद्देश्य 
गंतव्य बस एक पड़ाव 
मंज़िल की कौन सोचता है? 

और फिर होती है शाम 
दिन भर का थका हारा वक़्त 
जब थोड़ी साँस लेता है 
तब तारी होता है 
तुम्हारा पुरसुकून ख़याल 
पड़ावों के बीच जैसे 
मंज़िल का गुमान 
मुझमें तुममें कोई तो राह है! 

डाॅ विभास मिश्रा

Saturday, June 11, 2016

क्या करें ?


रात का पिछला पहर है, 
व्यग्र है जो भी लहर है। 
ढीठ बन पुरवाइयों ने, 
फिर जगाया कौन स्वर है ? 
मूँदकर पलकें तो देखें, 
कौन सा सपना मुखर है, 
रात के पिछले पहर का क्या करें ? 

दोष क्या कादम्बिनी का ? 
रेत का मन ही हमारा। 
पत्थरों की इस गली में 
काँच का है घर हमारा। 
जब कभी मधुमास छाया, 
मन हुआ पतझड़ हमारा। 
टूट जातीं व्यग्र लहरें 
चूम पथरीला किनारा। 
टूट कर बिखरी लहर का क्या करें ? 

संशयों के जाल में फँस, 
फड़फड़ाता मन हमारा, 
पर सदा आकाश छूने को 
मचलता मन हमारा, 
जूझता शंका, द्विधा के 
पाश से भी जो न हारा, 
लोल लहरों से प्रताड़ित, 
ढह रहा पल पल किनारा, 
मन बड़ा आकुल, भँवर का क्या करें ? 

नवपलाशों से सुलगती 
पोर तक पहुँची पिपासा। 
जेठ की इस दोपहर में, 
हंस मर जाये न प्यासा, 
गिद्ध बन मँडरा रही है, 
प्राण तक पैठी निराशा। 
बुद्धि की निर्मम नदी में 
है हृदय का घाट प्यासा। 
जेठ की इस दोपहर का क्या करें? 

सरलता, संवेदना की 
निष्कपट गहराइयों से। 
कुमुद, महुए, केतकी से, 
उन सघन अमराइयों से, 
यह नगर अनजान क्यों है 
स्नेह की परछाइयों से ? 
पत्थरों के इस नगर का क्या करें ? 

आँधियाँ चलने लगी हैं, 
हम चढ़े जब भी शिखर पर। 
बिजलियाँ गिरती रही हैं 
क्यों हमारे ही शिविर पर?
प्रश्नचिन्हों ने न छोड़ा, 
आजतक पीछा कहीं पर। 
वर्जनाओं के तने फन, 
हम रुके जिस ठौर पल भर। 
वे कहाँ लौटे कभी जो 
चल पड़े ऐसी डगर पर। 
धुंध में खोती डगर का क्या करें? 

मत लगाओ आज अंकुश, 
इस उफनती सी लहर पर। 
अब सुधा हो या गरल हो, 
आज झरने दो अधर पर। 
छाँह के प्यासे चरण अब, 
दृष्टि पर मेरी शिखर पर। 
राख हो जायें भले ही, 
आग की तपती डगर पर, 
नीड़ छूटे, साँस टूटे, 
ध्यान क्या दूँ भंग स्वर पर ? 
नीड़ से बिछड़ी डगर का क्या करें ?" 

*****शैलेन्द्र कुमार