Tuesday, September 01, 2015

ज़िंदगी




1
बिजली के तारों पर,
ऊँचे अटकी, फड़फड़ाती,
फटी पतंग होती है,
ज़िंदगी,
शीत, घाम, मेह सहती
ख़त्म हो जाती है।
2
चक्रवर्ती गणित का
सबसे कठिन सवाल
होती है ज़िंदगी,
हल करने में ही
निकल जाती है
पूरी ज़िन्दगी। 

संजीव ठाकुर

Tuesday, August 25, 2015

"संत कवि" तुलसीदास को समर्पित "नवधा"




अमोघ राम मंत्रोच्चारण दंतावली विकसित अन्तर तल
जननी-वत्सलता से वञ्चित पितृत्व प्रेम से रहे विकल ।१।
 
फिर बारी आई चुनिया की धात्री कम थी, ममता चंचल
विधना का लेख अलेख्य रहा वह छोड़ एकाकी चली निकल।२।
 
ऐसा जब होना होता है अक्सर ऐसा ही होता है
तुलसी के साथ भी ऐसा ही नियति का चलता खेल सकल ।३।
 
नारी नर की, नर नारी का, बन सका अभेद नहीं मनका
तुलसी जग से मुँह क्यों फेरें ले नारायण वाला मनका।४।
 
ऐसा कामी ऐसा रामी सुन्दर विनम्र ऐसा सर्जक
फिर हनुमान की पूँछ पकड़ मंजुल मानस मंगल गायक।५।

 हे लोकवन्द्य! ले कथा रम्य, शंकर वाचक सब सुनी उमा,
थे भारद्वाज कथा वाचक, हुई याज्ञवल्क्य की धन्य प्रमा ।६।
 
इससे बढ़कर भी बात चली, यह "शीलकथा" सुन्दर निकली,
हो गए जटायु धन्य-धन्य, सुन काकश्रेष्ठ वर वचन रम्य।७।
 
युग से युग को अवदान मिले, जनमानस को वरदान मिले,
तुलसी वन के तुलसी बनकर, हर घर आँगन में स्नेह पले।८।
 
संत कवि को है समर्पित, वंदना के गीत अविकल,
अलख का बनकर पुजारी, हो रहा मन आज निश्छल।९।
  
विन्ध्याचल पाण्डेय "मधुपर्क"

Saturday, June 13, 2015

सप्तपदी


 


रागिनी के नम्र सम्मान में प्रत्युत्तरित है।
गान भरती कोकिला मधुकुंज में
प्रेम के पाथेय पुलकित प्राण से
है अनागत की नवल परिकल्पना
है समर्पण भाव के किंजल्क से।१

क्या करूँ अर्पण तेरे उपचार में
यह हृदय पर वेदना का भार है
मैं अकेला हूँ नहीं इस विश्व में
है प्रतीक्षा अर्चना उपहार है।२

सृष्टि के उपहार थे तुम दिव्य थे
सृजन का श्रृंगार बनता क्यों नहीं
जो मिला प्रतिदाय में इस गोत्र को
सोचता चुकता करूँ क्या है सही।३
है प्रत्यंचित हर दिशा सौगंध से
नीलिमा नभ की हमें ललचा रही
रागिनी अब काकली क्यों बन गयी
दृष्टि में खुशबू कहाँ से आ रही।4

नय विनय विज्ञान की संभावना
दीख रही प्राची प्रतीची पार भी
दीप लेकर हर कदम रक्तिम चरण
ले समन्वय का नया संधान भी।5

क्षितिज अंचल आज भी अरूणाभ है
है उषा के पार कोई गा रहा
चीड़ फुनगी फैलती नभ वक्ष पर
धवल केतु व्योम में लहरा रहा।6

काननी की मानिनी किलकित रहे
गंधगर्भा है अनाविल उर्वरा
क्या नहीं थी कामना उर में तेरे
वर विपंची भी रहे स्वर से भरा।7

विन्ध्याचल पाण्डेय. मधुपर्क(सम्प्रति नेतरहाट के शिक्षक)