Tuesday, August 20, 2013

लेडी डॉक्टर (हास्य कविता)








हुआ गजब संयोग एक दिन,
जब मैं भटक रहा था अस्पताल में,
लगा कल तक धरती पर था,
आज आ गया कहाँ पाताल में?

खैर, सिर्फ अपनी बात नहीं थी, 
सब भटक रहे थे उसी हाल में,
भागते दौड़ते खोज रहे थे कुछ, 
कुछ धीमी, कुछ तेज चाल में।

तभी हुआ सौभाग्य उदित, 
मन हुआ स्वयमेव मुदित, 
धवल वस्त्र में धीर चाल में,
प्रकट देवी हुईं उसी काल में।

वो रखती अपने पग जिधर, 
रास्ता तुरंत बन जाता उधर,
कोमल काय, कंधे पर आला, 
मुख बंद जैसे लगा हो ताला।

सोचा उस डिपार्टमेंट का एड्रेस, 
बता देंगी ये विदाउट स्ट्रेस, 
इनको अवश्य होगा ज्ञान, 
चेहरा इनका देदीप्यमान।

"सिस्टर, कहाँ साइटोलोजी...?"
कहा मैंने विनम्रमुख, 
"सिस्टर"...सुनते ही बदल गया, 
मैडम के चेहरे का रुख।

चेहरे पर ही उतर आया उनके, 
पूरे शरीर का हीमोग्लोबिन,
 मैं बस अवाक् खड़ा देखता 
रह गया उनकी ओर दीन।

रक्तमुखा की आँखे जल उठी, 
जैसे ओपरेशन थेटर की लाइट, 
मुझे समझ ना आया कुछ भी 
क्यों हो रही मैडम टाइट ??

"डॉक्टर को सिस्टर कहते हो, 
पढ़े-लिखे हो या गँवार हो ??"
गरजी मोहतरमा मुझपर, जैसे 
टेस्ट टयूब पर लाठी प्रहार हो।

फिर दिया अंग्रेजी में सन्देश, 
पढ़ आई थी शायद विदेश;
मैंने "सॉरी" कह राह पकड़ ली, 
आगे मेरी जीभ जकड़ गयी।

और कुछ सीखा न सीखा,
एक बात सीख गए हम, मिस्टर!
कि लेडी डॉक्टर कभी किसी की 
हो ही नहीं सकती है सिस्टर।
आशीष चन्दन 
वर्ष - 1998- 2002 ; 
क्रमांक - 68;   
आश्रम - आनंद.

Saturday, August 03, 2013

मुस्कान - एक कविता



विधा - मुक्त छंद 

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मेरी पेशानियों पर बल पड़ा था,
नसें तमतमा रही थीं चेहरे की,
आँखें बिन बरसी मेघ बनी थी पर,
बिजलियाँ कड़क रही थी।
जबड़े जानी दुश्मनों की तरह भिंच रहे थे आपस में,
ग्लानि भी थी कुछ निर्णयों की।

तभी मैंने कुछ दूर से खुद को देखा।

अपनी पेशानियों पर बल पड़ते देखा,
चेहरे की नसों को तमतमाते देखा,
आँखों के मेघ और तड़ित को देखा,
गुथ्थमगुथ्था अपने जबड़ों को देखा,
अपने निर्णयों को लड़ते देखा।

अब बताऊँ मैंने क्या देखा??

अपनी पेशानियों को धीमा पड़ते देखा,
चेहरे की नसों को थमते देखा,
आँखों को शुभ्र और शांत होते देखा,
अपने जबड़ो को भाइयों की तरह,
आपस में गले मिलते देखा।
मैंने भूत को विलुप्त होते देखा.

फिर बताऊँ मैंने क्या देखा??

मैंने खुद को मुस्कुराते देखा।

आशीष चन्दन,

वर्ष - 1998- 2002 ;

क्रमांक - 68;

आश्रम - आनंद.

Monday, July 08, 2013

दर्दे-दिल - एक कविता






गोमुख अब तो डोल रहा है,
काशी बम-बम बोल रहा है,
इसमें नालों की बरसात,
गंगा बहे है सारी रात-


नीलकंठ के जटा से निकली,
शैलपुत्री का वरदान लिया,
ऋषियों के आँगन में जाकर,
उनका भी सम्मान किया,

मेरे धवल नीर को तेरे विषबेलों ने स्याह किया,
मोक्षदायनी के वजूद को दोज़ख की आग से पार किया,
बदरंग मेरे चेहरे को कहीं देख ले ये कायनात,
गंगा बहे है सारी रात-

खुला पारीना दफ्तर वर्क वर्क सफहा-सफहा,
हर वर्के पर लिखी है,तेरे जुर्म की दास्ताँ,
मैंने तुमको दिया है जीवन,तुमने मुझको ज़हर दिया,
तुम्हारी सफ्फाकी ने मेरा वजूद तार-तार किया,

आफताब की चमक से मेरे घाव हरे हो जाते हैं,
इतने पापों के बोझ से सारे मरहम ज़हर बन जाते हैं,
तेरे पापों की गठरी में इन घावों को बांध-बांध ले जाती हूँ,
इसलिए दिन के उजाले में चेहरा नहीं दिखाती हूँ,
कब आएगा वह दरिया,जो करेगा मुझको आत्मसात,
गंगा बहे है सारी रात-
============================   डॉ. कुंदन कुमार, 12 
                                                                    अरुण आश्रम, 1968-1975